ज़ख़्म दिल के अगर सिये होते
अहल-ए-दिल किस तरह जिये होते
वो मिले भी तो इक झिझक सी रही
काश थोड़ी सी हम पिये होते
आरज़ू मुतमइन तो हो जाती
और भी कुछ सितम किये होते
लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़्श दी उसने
हौसले भी 'अदम्' दिये होते
ज़ख़्म दिल के अगर सिये होते
अहल-ए-दिल किस तरह जिये होते
वो मिले भी तो इक झिझक सी रही
काश थोड़ी सी हम पिये होते
आरज़ू मुतमइन तो हो जाती
और भी कुछ सितम किये होते
लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़्श दी उसने
हौसले भी 'अदम्' दिये होते
zakhm dil ke agar siye hote
ahal-e-dil kis tarah jiye hote
vo mile bhī to ik jhijhak sī rahī
kāśh thoṛī sī ham piye hote
ārazū mutamain to ho jātī
aur bhī kuchh sitam kiye hote
lazazat-e-ġham to bakhśh dī usne
hausle bhī 'adam' diye hote