शल्ल हुए पाँव मेरे इश्क़ में मन्ज़िल के क़रीब
नज़र-ए-तूफ़ां हुई कशती मेरी साहिल के क़रीब
शिद्दत-ए-दर्द ही मुम्किन है मदावा हो जाए
आप लाएं तो ज़रा हाथ मेरे दिल के क़रीब
फ़ैज़-याबी के सबब लूट लिया ग़ैरों ने
आह भी अपनी ना पुह्ँची तेरी मेहफ़िल के क़रीब
अल्लह अल्लह तेरे रन्गीन लबों की जुँबश
रह गैइ कौँद के बिजली सी मेरे दिल के क़रीब्