शाम-ए-ग़म जब बिखर गई होगी
जाने किस किस के घर गई होगी
इतनी लरज़ाँ न थी चराग़ की लौ
अपने साये से डर गई होगी
जिस तरफ़ वो सफ़र पे निकला था
सारी रौनक उधर गई होगी
मेरी यादों की धूप चाँव में
उसकी सूरत निखर गई होगी
शाम-ए-ग़म जब बिखर गई होगी
जाने किस किस के घर गई होगी
इतनी लरज़ाँ न थी चराग़ की लौ
अपने साये से डर गई होगी
जिस तरफ़ वो सफ़र पे निकला था
सारी रौनक उधर गई होगी
मेरी यादों की धूप चाँव में
उसकी सूरत निखर गई होगी
śhām-e-ġham jab bikhar gaī hogī
jāne kis kis ke ghar gaī hogī
itnī larazāṇ na thī charāġh kī lau
apne sāye se ḍar gaī hogī
jis taraf vo safar pe niklā thā
sārī raunak udhar gaī hogī
merī yādoṅ kī dhūp chāṇv meṅ
uskī sūrat nikhar gaī hogī