क़िस्सा-ए-शौक़ कहूँ दर्द का अफ़साना कहूँ
दिल हो क़ाबू में तो उस शोख़ से क्या-क्या न कहूँ
कुछ है इकरार उन्हें अपनी सितमगारी का
फिर भी इसरार है मुझसे के मैं ऐसा न कहूँ
आप बैठें तो सही आ के मेरे पास कभी
के मैं फ़ुरक़त में हदीस-ए-दिल-ए-दीवाना कहूँ
क़िस्सा-ए-शौक़ कहूँ दर्द का अफ़साना कहूँ
दिल हो क़ाबू में तो उस शोख़ से क्या-क्या न कहूँ
कुछ है इकरार उन्हें अपनी सितमगारी का
फिर भी इसरार है मुझसे के मैं ऐसा न कहूँ
आप बैठें तो सही आ के मेरे पास कभी
के मैं फ़ुरक़त में हदीस-ए-दिल-ए-दीवाना कहूँ
qissā-e-śhauq kahūṇ dard kā afsānā kahūṇ
dil ho qābū meṅ to us śhokh se kyā-kyā na kahūṇ
kuchh hai ikrār unheṅ apnī sitamgārī kā
phir bhī isrār hai mujhse ke maiṅ aisā na kahūṇ
āp baiṭheṅ to sahī ā ke mere pās kabhī
ke maiṅ furaqat meṅ hadīs-e-dil-e-dīvānā kahūṇ