कोई ये कह दे गुलशन-गुलशन
लाख बलायें एक नशेमन
फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन
लेकिन अपना-अपना दामन
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रौशन
रहमत होगी तालिब-ए-इसियाँ
रश्क करेगी पाकी-ए-दामन
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाये अपना दामन्
कोई ये कह दे गुलशन-गुलशन
लाख बलायें एक नशेमन
फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन
लेकिन अपना-अपना दामन
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रौशन
रहमत होगी तालिब-ए-इसियाँ
रश्क करेगी पाकी-ए-दामन
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाये अपना दामन्
koī ye kah de gulaśhan-gulaśhan
lākh balāyeṅ ek naśheman
phūl khile haiṅ gulaśhan-gulaśhan
lekin apnā-apnā dāman
āj na jāne rāz ye kyā hai
hijr kī rāt aur itnī rauśhan
rahmat hogī tālib-e-isiyāṇ
raśhk karegī pākī-e-dāman
kāṇṭoṅ kā bhī haq hai kuchh ākhir
kaun chhuṛāye apnā dāman