ख़ाब बनके बिखरती जाती है
रात दिल में उतरती जाती है
रंग किसके चुरा लिये उसने
रोज़-ओ-शब वो निखरती जाती है
आ के उम्मीद में जला के चराग़
आज तो वो सँवरती जाती है
आ गया वो तो उम्र भर की थकन
जैसे पल में उतरती जाती है
ख़ाब बनके बिखरती जाती है
रात दिल में उतरती जाती है
रंग किसके चुरा लिये उसने
रोज़-ओ-शब वो निखरती जाती है
आ के उम्मीद में जला के चराग़
आज तो वो सँवरती जाती है
आ गया वो तो उम्र भर की थकन
जैसे पल में उतरती जाती है
khāb banke bikhartī jātī hai
rāt dil meṅ utartī jātī hai
raṅg kiske churā liye usne
roz-o-śhab vo nikhartī jātī hai
ā ke ummīd meṅ jalā ke charāġh
āj to vo sṇvartī jātī hai
ā gayā vo to umr bhar kī thakan
jaise pal meṅ utartī jātī hai