रस्म-ए-उल्फ़त को निभाये तो निभाये कैसे
रस्म-ए-उल्फ़त को निभाये तो निभाये कैसे
हर तरफ आग है दामन को बचाये कैसे
दिल की राहों में उठाते है जो दुनियावाले
कोई कह दे की वो दीवार गिराये कैसे
दर्द में डूबे हुए नग़्मे हज़ारों हैं मगर
साज़-ए-दिल टूट गया हो तो सुनाये कैसे
बोझ होता जो गमोँ का तो उठा भी लेते
ज़िन्दगी बोझ बनी हो तो उठाये कैसे
rasm-e-ulफ़t ko nibhāye to nibhāye kaise
har taraph āg hai dāman ko bachāye kaise
dil kī rāhoṅ meṅ uṭhāte hai jo duniyāvāle
koī kah de kī vo dīvār girāye kaise
dard meṅ ḍūbe hue naग़me haज़āroṅ haiṅ magar
sāज़-e-dil ṭūṭ gayā ho to sunāye kaise
bojh hotā jo gamoṇ kā to uṭhā bhī lete
ज़indgī bojh banī ho to uṭhāye kaise