ओ मेरे शाह-ए-खुबां, ओ मेरी जान-ए-जानाना
तुम मेरे पास होते हो, कोई दूसरा नहीं होता
कब ख़यालोंकी धूप ढलती है
हर कदम पर शमा सी जलती है
मेरा साया जिधर भी जाता है
तेरी तस्वीर साथ चलती है
तुम हो सेहरा में, तुम गुलिस्तां में
तुम हो ज़र्रों में तुम बियाबाँ में
मैंने तुमको कहाँ कहाँ देखा
छुपके रहते हो तुम रग-ए-जां में
मेरी आँखों की जुस्तजू तुम हो
इल्तिजा तुम हो, आरज़ू तुम हो
मैं किसी और को तो क्या जानूँ
मेरी उल्फ़त की आबरू तुम हो