Kaash Aisa Koi Manzar Hota

काश ऐसा कोई मंज़र होता
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काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे काँधे पे तेरा सर होता

जमा करता हुआ जो मैं आये हुए संग
सर छुपाने के लिए घर होता

इस बुलंदी पे बहोत तनहा हूँ
काश मैं सब के बराबर होता

उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना एक और कलंदर होता